Wednesday, November 2, 2011

राइट टू रिजेक्ट जैसा कानून पहले से है

भारतवर्ष में चुनावों के समय एक अरब पच्चीस करोड नागरिकों में से औसतन ५० से ५५% अर्थात लगभग अडसठ करोड पचास लाख ही मतदाता ही अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं एवं इनमें से लगभग ३३% अर्थात बाईस करोड अडसठ लाख पिचहत्तर लाख मतदाताओं के मतदान के कारण कोई दल अपने सहयोगियों के साथ सत्ता में आता है ! जो कि लगभग भारतवर्ष की कुल जनसँख्या के १८.२५ % हैं बाकी बचे ४५ से ५०% मतदाताओं में से अधिकांश अपने मताधिकार का प्रयोग इस कारण से नहीं करते क्यूंकि उन्हें लगता है सभी राजनैतिक दलों के प्रत्याशी आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त हैं अथवा पहले से भ्रष्टाचार अथवा व्यभिचार में लिप्त हैं एवं मतदाताओं को यह लगता है कि सभी दुष्टों में से किसी एक दुष्ट को चुनने से अच्छा यह है कि वे अपने मताधिकार का प्रयोग ना करें परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि यह संभव है कि उनके नाम से किसी बेईमान प्रत्याशी का चाटुकार व्यक्ति उनके स्थान पर मताधिकार का प्रयोग कर सकता हैं एसी कीच घटनाएँ पिछले चुनावों में सामने आयीं भी हैं और बहुत से मतदाताओं को यह आशा है कि इस बार अन्ना हजारे के अनशन का समर्थन कर वे लोकपाल ,राईट टू रिकाल अथवा राईट टू रिजेक्ट के विधेयक को पारित करवा लेंगे परन्तु सरकार के प्रतिनिधियों व मंत्रियों के .इन विधेयकों के प्रति रूखे व्यव्हार के कारण यह प्रतीत नहीं होता कि वे ऐसा कोई कठोर विधेयक को पारित करेंगे भी अथवा उनके मूल रूप में पारित करेंगे क्यूंकि ये साधारण जनता के ऐसे अधिकार के रूप में विकसित होंगे जिसका प्रयोग कर सधारण नागरिक इन नेताओं को कठपुतली की समान अपनी उँगलियों पर नचा सकते हैं कौनसा नेता अपने हाथों से से अपने लिए गड्ढा खोदेगा 
परन्तु वर्तमान में एक ऐसा नियम है जिसका प्रयोग कर अपने मत का प्रयोग ना करने वाले तथा भ्रष्ट व्यवस्था से व्यथित नागरिक भी राजनैतिक दलों को विवश कर सकते हैं कि वे अपराधी,व्यभिचारी एवं भ्रष्ट प्रत्याशियों को हटाकर साफ़ एवं स्वच्छ छवि के प्रत्याशी चुनाव में उतारें 


मतदान के समय आप अपने चुनाव क्षेत्र के मतदान अधिकारी से फॉर्म 49-O की मांग करें जिसकी भाषा लगभग यह होगी कि “वर्तमान सभी प्रत्याशी राजनेता बनने के पात्र नहीं हैं इस कारण मैं अपने मत का प्रयोग इन सभी को अपात्र घोषित में करने में करता हूँ “
जो मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते उनकी जगह किसी प्रत्याशी के समर्थक जाकर मतदान कर देते हैं जिसका लाभ भ्रष्ट प्रत्याशी को मिलता हैं यदि ऐसे मतदाता फॉर्म ४९-ओ का प्रयोग करते हैं तो उनके मत का दुरूपयोग की संभावनाएं समोत हो जाती है

साथ ही अपने क्षेत्र के चुनाव प्रत्याशियों के बारे में जानने की लिए लिखें myneta(रिक्त स्थान) अपने क्षेत्र का पिन कोड अथवा पोस्टल कोड और भेज दें 56070 पर अथवा डायल करें 1800110440आपको अपने क्षेत्र के प्रत्याशियों के बारे में सारी जानकारी मिल जायेगी उनके द्वारा अर्जित संपत्ति ,न्यायालय में कोई वाद चल रहा हो अथवा किसी थाने में कोई एफ.आई.आर है तो सारी जानकारी आपको इन नं पर सन्देश भेज कर अथवा वार्ता कर पता चल सकता है 
साथ यदि फॉर्म ४९-ओ के मतदाताओं की संख्या जीतने वाले प्रत्याशी को मिलने वाले मतों की संख्या से अधिक हो जाती तो उस क्षेत्र के चुनाव निरस्त हो जायेंगे एवं राजनैतिक दलों को नए प्रत्याशी चुनाव में उतारने होंगे इस प्रक्रिया से पुनः चुनावों का व्यय का भर तो साधारण जन पर पडेगा परन्तु वह अगले पांच वर्षों में होने भ्रष्टाचार के माध्यम से होने वाले धन की हानि से कई गुना कम होगा
राइट तो रिजेक्ट में लगभग यही है नए कानून बनाने से बेहतर है कि इसी में एक संशोधन करने कि मांग करी जाये फॉर्म 49-O में मतदाता का नाम लिखाना आवश्यक होता है यदि इसे संशोधित कर अन्य मतदातों की भांति फॉर्म 49-O का प्रयोग करने वाले मतदाताओं के नाम का खुलास ना करने का प्रावधान हो तो यह भी एक सशक्त कानून है जिसका प्रयोग कर राजनीती में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं आपराधिकरण को जड से समाप्त किया जा सकता है

Wednesday, June 22, 2011

खे लेने दो आज नाव ,,कल कर पतवार रहे ना रहे
जीवन सरिता में फिर शायद ये रसधार बहे ना बहे
अंतिम श्वास निकालने तक है "बिस्मिल "की अभिलाषा यही
वैभव तेरा अमर रहे माँ हम दिन चार रहें ना रहें - अमर शहीद पंडित राम प्रसाद "बिस्मिल "

Wednesday, March 30, 2011


डाक्टर वशिष्ठ नारायण सिंह का नाम यदि आप कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में लेंगे तो आपको बहुत ही सम्मान के साथ देखा जायेगा परन्तु विडंबना देखिये भारत में इनके नाम से बहुत ही कम लोग परिचित हैं डाक्टर वशिष्ठ नारायण सिंह किसी समय में भारत में रामानुज की कोटि के गणितज्ञ बनकर उभरे थे।
बिहार के भोजपुर जिला स्थित बसंतपुर गाँव में एक सिपाही के परिवार में 2 अप्रैल 1944 को जन्मे इस गणितज्ञ ने छोटी सी उम्र मे ही अपनी प्रतिभा के बलबूते सभी को हैरान कर दिया था सन् 1962 में नेतरहाच स्कूल से दसवीं की परीक्षा में राज्यस्तर पर प्रथम स्थान मिला इसके बाद इन्होंने पटना साइंस काँलेज में इंटरमीडियेट की के लिये प्रवेश लिया यहीं पर इनकी गणित की विलक्ष्ण प्रतिभा को देख काँलेज के प्रोफेसर चकित रह गये और पटना विश्वविद्यालय की नियमावली में संशोधन कर इन्हें समय से पूर्व ही स्नातक की उपाधी दे दी गयी । इनसे प्रभावित होकर अमेरिका की बर्कले यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर केली 1963 भारत आये और छात्रवृति पर उन्हें बर्कली के कैललिफोर्निया विश्वविध्यालय ले गये जहाँ इनकी प्रतिभा के कारण इन्हे जीनियसों का जीनियस के नाम से संबोधित किया जाने लगा। 1969 मे उन्होने कैलीफोर्निया विश्वविघालय मे पी.एच.डी. प्राप्त की। साइकिल वेक्टर स्पेश थ्योरी(Cycle Vector Space Theory) पर किये गए उनके शोध कार्य ने उन्हे भारत और विश्व मे प्रसिद्ध कर दिया।और वहीं से इन्हे डी.लिट की उपाधि घणित के क्षेत्र में किये गये अनुसंधान के कारण मिली। अपनी पढाई खत्म करने के बाद कुछ समय के लिए वे कुछ समय के लिए भारत आएमगर जल्द ही वे अमेरिका वापस चले गए। अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी आफ वाशिंगटन में सितंबर 1969 से जून 1971 तक 1165 डालर की रिसर्च एंड टीचिंग की नौकरी परन्तु देश सेवा के ज़ज्बे कारण वह नौकरी छोडकर आ गये और कानपुर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी में मात्र 800 रुपये पर वर्ष 1971 से 1972 तक रिसर्च एंड टीचिंग का कार्य किया। इसके बाद वर्ष 1972 में ही वे सांख्यिकी संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजीकोलकाता में नौकरी पर चले गए। अमेरिका में उस समय यह वेतन बहुत अच्छा माना जाता था परन्तु भारत में इतने कम वेतन के कारण उनकी पत्नी से अनबन होने लगी और तलाक भी हो गया। यही वह समय था जब उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। सिजो फ्रेनिया रोग की वजह से विक्षिप्त होने पर उनका इलाज डेविड अस्पताल व राजकीय मानसिक आरोग्यशालारांची में कराया गया। इसके बाद वे गांव लौट आए। उन्हे अगस्त 1989 को रांची के एक चिकित्सक से दिखा कर उनके भाई ट्रेन से किर्की (पुणे) ले जा रहे थे। रास्ते में खंडवा स्टेशन पर अगस्त 1989को वे उतर गए और भीड़ में कहीं खो गए। करीब पांच वर्ष तक गुमनाम रहने के बाद उनके गांव के लोगों ने उन्हे छपरा में पाया तो वे गांव लाए गए। इसके बाद राज्य सरकार ने उनकी सुध ली। उन्हे विमहांस बेंगलूर इलाज के लिए भेजा गया। जहां मार्च 1993 से जून 1997 तक इलाज चला। इसके बाद से वे गांव में ही रह रहे थे। तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री शत्रुध्न सिन्हा ने इस बीच उनकी सुध ली थी । स्थिति ठीक नहीं होने पर उन्हे सितंबर 2002 को मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया। उस दौरान करीब एक साल दो महीने तक उनका यहां इलाज चला था। स्वास्थ्य में लाभ देखते हुए उन्हें यहां से छुट्टी दे दी गई थी।  उनके भतीजे राकेश का कहना है कि पहले जब उन्हें दिल्ली लाया गया था तब भी वे उनके साथ थेवर्ष 2003 से अब तक वे गांव में ही रहे। छात्रों को उन्होंने पढ़ाया भी लेकिन एकाएक चिड़चिड़ापन आने से उनका व्यवहार बदल गया। .एक बार फिर से बिहार सरकार ने विश्वविख्यात गणितज्ञ के इलाज के लिए पहल की है.विधान परिषद की आश्वासन समिति ने 12 फरवरी ,2009 को पटना में हुई अपनी बैठक में डॉ. सिंह को इलाज के लिए दिल्ली भेजने का निर्णय लिया. समिति के फैसले के आलोक में भोजपुर जिला प्रशासन ने उन्हें रविवार दिनांक 12 अप्रैल ,09 को दिल्ली भेजा.उनके साथ दो डॉक्टर भी भेजे गये हैं. दिल्ली के मेंटल अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टरों की परामर्श पर उन्हें आगे के खर्च का बंदोबस्त किया जाएगा. स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि दिल्ली में परामर्श के बाद यदि जरूरत पड़ी तो उन्हें विदेश भी ले जाया जा सकता है.अभी वे अपने गाँव बसंतपुर मे उपेक्षित जीवन व्यतीत कर रहे थे. पिछले दिनों आरा में उनकी आंखों में मोतियाबिन्द का सफल ऑपरेशन हुआ था

Monday, March 28, 2011

कुक विद्रोही गुरमुख सिंह

अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना भी धर्म है गुरु राम सिंह कूका ने अपने शिष्यों को संकट की घडी में यही प्रेरणा दी १८५७ की क्रांति के बाद कूका विद्रोहियों ने अंग्रेजों से मोर्चे लेने शुरू किये कूका क्रांतिकारियों ने समूचे पंजाब को २२ हिस्सों में विभक्त कर हर हिस्से की ज़िम्मेदारी एक व्यक्ति को सोंपकर अपनी गतिविधियां प्रारंभ की हर अभियान ने पहले क्रन्तिकारी ईश्वर के नाम की हुंकार लगते थे जिसमें ब्रिटिश सरकार के लिए एक चेतावनी हुआ करती थी इसी कूक के कारण ये लोग कूका के नाम से संबोधित किये जाते थे इन लोगों ने ब्रिटिश सरकार की समानांतर व्यवस्थाएं खड़ी कर दी थी जिससे ब्रिटिश सतर्क हो गए और पंजाब में धरपकड शुरू हो गयी और क्रांतिकारियों एक एक १३ साल का बच्चा भी पकड़ा गया गुरुमुख सिंह कूका अंग्रेजों ने सभी क्रांतिकारियों को तोप के मुहँ से बांध कर उड़ने की सजा सुनाई जब गुरुमुख सिंह की बारी आई तो इनकी सुकुमारता और अल्पायु देख कर एक अँगरेज़ महिला ने अँगरेज़ अधिकारी को इनपर दया दिखाने का अनुरोध किया जिससे उसने माना लेकिन एक शर्त के साथ की गुरुमुख सिंह माफ़ी मांगें और ब्रिटिश हुकुमत जिंदाबाद कह यह कहना था की गुरुमुख सिंह का रक्त खोलने लगा और उन्होंने आक्रमण कर दिया उस अधिकारी पर ब्रिटिश की लम्बाई अधिक होने के कारण उसकी दाढ़ी कसकर पकड़ ली और जोर से हुकार भरते हुए कहा कि मैं आज इसे सबक सिखा कर रहूँगा लोगों ने दाढ़ी छुडवाने का भरसक प्रयास किया लेकिन बालक के दिल में देशभक्ति के ज़ज्बे ने एक शक्ति का संचार कर दिए जब सारे प्रयास असफल हो गए तो वीर बालक के हाथ काटकर उस ज़ालिम कि दाढ़ी छुडवा पाए और तलवार से वीर बालक के टुकड़े टुकड़े कर दिए गए शब्द नहीं हैं मेरे पास किन शब्दों में नमन करूँ बस आंसू हैं मेरे पास जिनकी श्रधाँजली देता हूँ ऐसे वीर बालक को